श्री जीन माता मंदिर: आस्था, इतिहास और चमत्कारों का प्रतीक

राजस्थान के सीकर ज़िले में स्थित श्री जीन माता मंदिर न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि इसका इतिहास और संस्कृति में भी खास स्थान है।

राजस्थान के सीकर जिले के शक्तिपीठों में से एक है प्राचीन जीण माता मंदिर (Jeen Mata Mandir), जो न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत में श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। जीनमाता गांव, सीकर से लगभग 29 किमी और जयपुर से करीब 108-120 किमी दूर स्थित है। यह मंदिर अरावली की पहाड़ियों में बसा है और पास ही का गांव रेवासा मंदिर से मात्र 10 किमी की दूरी पर है। यहाँ तक पहुंचना आसान है और आसपास धार्मिक पर्यटकों के लिए धर्मशालाओं की भरमार है।

जीण माता को ‘जिण भवानी’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से कोढ़ जैसे असाध्य रोग भी ठीक हो सकते हैं। साथ ही, जब भक्तों की मनोकामना पूरी होती है, तो वे सिर पर जलते कोयले की सिगड़ी या झंडा लेकर पैदल यात्रा करते हुए जीण धाम पहुंचते हैं।

जीण माता का जन्म और तपस्या

मां जीण का जन्म राजस्थान के चूरू जिले के एक गांव घांघू में हुआ था। वे चौहान वंश के राजघराने की कन्या थीं। पारिवारिक परिस्थितियों के चलते माता जीण ने गृह त्याग कर अरावली की पहाड़ियों में तपस्या के लिए प्रस्थान किया। वे सीकर के पास वर्तमान में स्थित स्थान पर आकर ध्यान और साधना में लीन हो गईं।

उनके बड़े भाई हर्ष, जो माता से अत्यंत स्नेह करते थे, बहन को मनाने वहाँ पहुंचे, लेकिन माता ने वापस लौटने से इनकार कर दिया। भाई ने भी वहीं पास की पहाड़ी पर भैरव रूप में तपस्या शुरू कर दी। यही स्थान आज हर्षनाथ मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है।

यह कथा आज भी जीण माता और हर्षनाथ मंदिरों की संयुक्त पौराणिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।

औरंगज़ेब और माता की कृपा

जीण माता मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं में से एक है मुगल बादशाह औरंगज़ेब की हार।

इतिहास के अनुसार, जब औरंगज़ेब ने शेखावाटी क्षेत्र के मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया, तो जीण माता के भक्तों ने माता से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना का उत्तर माता ने चमत्कारी रूप में दिया।

कहते हैं, मंदिर को तोड़ने आई मुगल सेना पर मधुमक्खियों का विशाल झुंड टूट पड़ा, जिससे सैनिक भागने पर मजबूर हो गए।

कहा जाता है कि औरंगज़ेब इसके बाद गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उसने अपनी गलती स्वीकार की और माता से माफी माँगने स्वयं मंदिर आया। वहाँ उसने वचन दिया कि हर महीने सवा मण तेल से अखंड दीपक जलाया जाएगा। तभी से उसकी तबीयत में सुधार होने लगा और माता में उसकी आस्था भी बढ़ गई।

सेवा में समर्पित मुस्लिम परिवार

औरंगज़ेब द्वारा मां की महिमा स्वीकारने के बाद, उन्होंने एक मुस्लिम परिवार को मंदिर की सेवा में नियुक्त किया। आज भी उस परिवार की पीढ़ियाँ मंदिर की सफाई और सीढ़ियाँ धोने का कार्य श्रद्धा से करती हैं। यह इस मंदिर की सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी है।

कुलदेवी के रूप में मान्यता

श्री जीन माता को कई जातियों की कुलदेवी माना जाता है, जिनमें प्रमुख हैं:

  • राजपूत (शेखावत, चौहान, राव)
  • ब्राह्मण (आचार्य)
  • कुमावत, जांगिड़, माली, वैश्य (कासलीवाल, गुप्ता, अग्रवाल, खंडेलवाल)
  • यादव / अहीर, लोहार, बानिया आदि

यह मंदिर खासतौर पर शेखावाटी क्षेत्र के लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है।

मंदिर परिसर और विशेषताएँ

  • मंदिर तक पहुँचने के रास्ते में सुंदर प्राकृतिक दृश्य मिलते हैं। मंदिर घने जंगलों से घिरा हुआ है।
  • परिसर में कई धार्मिक धर्मशालाएं, भंडारे, और अखंड ज्योत की व्यवस्था है।
  • यहाँ हर साल चैत्र और आश्विन नवरात्रों में विशाल मेला लगता है, जिसे लक्की मेला भी कहा जाता है।
  • पहले यहां पशु बलि की परंपरा थी, जिसे अब सरकार और प्रशासन ने पूर्णतः बंद कर दिया है।

मंदिर से जुड़ी और मान्यताएँ

  • कहा जाता है कि माता प्रसाद में शराब भी स्वीकार करती हैं, जो एक अनोखी परंपरा है।
  • माता की कृपा से भक्तों की बीमारियाँ दूर होती हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • मंदिर से मात्र 26 किमी दूर खाटू श्याम जी मंदिर भी स्थित है, जिससे यह स्थल और भी पवित्र माना जाता है।

श्री जीन माता मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि रहस्य, आस्था, प्रेम और परंपरा का संगम है। इतिहास से लेकर आज तक यह मंदिर हर पीढ़ी को चमत्कार, श्रद्धा और भाई-बहन के प्रेम की गाथा सुनाता आया है।

यदि आप कभी राजस्थान की यात्रा पर जाएँ, तो जीन माता के दर्शन अवश्य करें — यह यात्रा आपकी आत्मा को छू जाएगी।



#Editors Choice #Navratri

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *